what is magnetic field of earth - चुंबकीय क्षेत्र

what is magnetic field of earth - चुंबकीय क्षेत्र

 what is magnetic field of earth ? -  हमें प्रकृति में हर जगह देखने को मिलता है। आकाशगंगाओ, अदृश्य परमाणु, मनुष्य और जानवर, सभी पर चुंबकीय क्षेत्र का प्रभाव देखने को मिलता है।

लेकिन चुंबकीय क्षेत्र के बारे में जाने से पहले हमें यह जानना होगा कि चुंबक क्या होता है ? what is magnetic field of earth ?

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what is magnetic field of earth -


चुम्बक किसे कहते है ?What is magnet ?

चुंबक 'शब्द की उत्पति एक द्वीप मैग्नीशिया के नाम से  है , जहां बहुत पहले 600 ईसा पूर्व चुंबकीय खनिजो के भंडार मिले थे।

 
 चुंबक (magnet) 🧲 उस पदार्थ को कहा जाता है , जो चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करते हैं ।

ये चुंबकीय पदार्थों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं । जैसे - लोहा
 अब हम जानेंगे , पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का कारण क्या है ? What is magnetic field of earth 
 

 what is magnetic field of earth -

 
यद्यपि पृथ्वी के magnetic field का कारण स्पष्ट नहीं है।
प्रारंभ में माना जाता था, कि पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र इसके अंदर बहुत गहराई में रखें एक विशाल चुंबक के कारण  है ।

जो पृथ्वी की घूमने की अक्ष के अनुदिश रखा है। 
 
Earth के अंदर लोहे का प्रचुर भंडार है इसलिए इसकी संभावना बहुत ही कम है कि लोहे का कोई विशाल चुंबक उत्तरी ध्रुव से चुंबकीय दक्षिणी ध्रुव तक फैला हो। 
 
 पृथ्वी का क्रोड बहुत गर्म तथा पिंगली हुई अवस्था में है। जिसमें धातुओं के आयन भी उपस्थित हैं। 

लोहे तथा निकिल के आयन पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के लिए उत्तरदाई है।
यह परिकल्पना सबसे अधिक संभावित है। 
 

अन्य ग्रहों के चुंबकीय क्षेत्र -

चंद्रमा जिसमें द्रव अवस्था में क्रोड नहीं है , जिसके कारण इसका कोई चुंबकीय क्षेत्र भी नहीं है ।                 
 
 शुक्र ग्रह की अपनी अक्ष  पर घूमने की गति अत्यंत कम है , इसलिए इसका चुंबकीय क्षेत्र भी बहुत कम है ।                        
जबकि बृहस्पति , जिस की घूर्णन गति ग्रहों में सर्वाधिक है , इसका चुंबकीय क्षेत्र भी बहुत अधिक शक्तिशाली है।

 किंतु इनकी उत्पत्ति के सही कारण तथा उन को बनाए रखने के लिए आवश्यक ऊर्जा उन कारणों को बहुत अच्छी तरह से नहीं समझा जा सका। 
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डायनमो प्रभाव -

 पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र इसके बाहरी क्रोड के धात्विक तरलों ( जिसमें अधिकांश पिंघला लोहा और निकिल है)
 की संवाहक गति के कारण उत्पन्न विद्युत धाराओं के परिणाम स्वरूप अस्तित्व में आता है , इसे डायनेमो प्रभाव कहा जाता है ।

सौर पवन -

 सूर्य से उत्सर्जित होने वाले आवेशित कण एक प्रवाह के रूप में पृथ्वी की ओर आते हैं जिसे सोर पवन कहा जाता है ।   
   
 इन कणों  की गति पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से प्रभावित होती है। और यह स्वयं भी पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र व्यवस्था मैं परिवर्तन ला सकते हैं।

पृथ्वी के ध्रुव के निकट चुंबकीय क्षेत्र अन्य भागों की तुलना में बिल्कुल अलग होते हैं। 

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पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में परिवर्तन -

जगहों के परिवर्तन के साथ -साथ पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में भी परिवर्तन देखने को मिलता है।

 पृथ्वी के  चुंबकीय क्षेत्र  की तीव्रता  का मान सतह पर  10-5टेस्ला की कोटी का होता है ।

समय के साथ  पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में परिवर्तन देखने को मिलता है।
इसमें कुछ ऐसे परिवर्तन है जो अल्पकालिक है, तथा कुछ शताब्दियों में ही नजर आने लगते हैं ।
 
 
 और लंबे समय में होने वाले परिवर्तन जो लाखों सालों में देखने मीलते हैं ।
पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र समय के साथ साथ परिवर्तित होता रहता है। 
 वैज्ञानिकों द्वारा यह पाया गया है कि 10 लाख वर्षों में पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र दिशा उलट जाती है। 
 
 ज्वालामुखी से निकलने वाले लावे में  लोहा पाया जाता है।
जब यह ठंडा होकर ठोस में बदलता है तो इसके अंदर के छोटे-छोटे लोह चुंबक चुंबकीय क्षेत्र की दिशा के समांतर व्यवस्थित हो जाते हैं ।
 
 ऐसे चुंबकीय क्षेत्रों से युक्त लावे के भंडारों के अध्ययनों से इस बात के प्रमाण मिले हैं कि अतीत में चुंबकीय क्षेत्र की दिशा कई बार उलट चुकी है। 

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